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कविता – जब ज़िन्दगी “आम” हुआ करती थी

संश्रुति साहू

जब ज़िन्दगी “आम” हुआ करती थी

बरस का इक मौसम
आम के नाम और हवाले है

गर्मी के दिन हमेशा
बचपन के नाम है

वो कोई और ही दौर था
मानो इस ज़िन्दगी का नहीं

उन दिनों का और फ़िल्हाल का
जैसे कोई ताल्लुक ही नहीं

बीती शामे अक्सर
याद के झरोके से झांकते हैं

अब बेमक्सद आते जाते शाम को
मुह चिढ़ा कर सताते हैं

बड़े शौक से आम के
टुकड़े हुआ करते थे तब

खबर किसे थी याद के किस्से
लम्हो में ढल रहे थे तब

गुठलियों के हासिल पर
बच्चों में लडाई होती थी

इल्म नहीं था तब आम के बहाने
रिश्तो की जड़ें मज़बूत होती थी

बेहद बेअदबी से लड़कपन में
आम खाया जाता था

आम खाने कि हरकत में तब
कांटे चम्मच का दिखावा कहां होता था

आम फ़क़त आम नहीं
जज़्बातो का मजमा हुआ करता था

प्लेट में पड़े आखरी आम के टुकड़े के लिए
अक्सर दंगा हुआ करता था

गर्मी की उन रातों का समा
कुछ और ही हुआ करता था

बिजली घंटों तक गुम
और अंधेरे का पहरा हुआ करता था

Candle light तो नहीं मगर
लैनटर्न की दबी दबी रोशनी का साथ हुआ करता था

किरोसीन की महक
हवा में घुला करती थी

घर के आंगन में
चटाई की चादर बिछा करती थी

सितारों का पहरा
सियाह आसमाँ में गहरा हुआ करता था

चाँद फ़लक़ से ताकता ये मन्ज़र
और फिर हमसे वो जला करता था

बड़ो के बज़्म में हर शय बचपन की
मेह्फ़ूज़ हुआ करती थी

दुनियादारी के पचडे से तब
ज़िन्दगी बेज़ार हुआ करती थी

आम की मेहफ़िल
हर गरमी की शाम को सजाया करती थी

बिन शर्तें प्यार की
दुनिया लुटा करती थी

जी हाँ कुछ ऐसे ही आम से
आम सा बचपन खास हुआ करता था

हसी के ठहाको का
समंदर बहा करता था

रिश्तो की गरमाहट में ऐसे ही
गरमी का मौसम बीता करता था

आम फ़क़त आम नहीं
एक जज़्बात हुआ करता था

धूप सुलगाती जिस्म कितना भी
पाँव में चप्पल और सायकल से याराना हुआ करता था

मन मस्ती के भन्वर में
बेहिसाब डूबा रहता था

हथेली गुलेल और पत्थर का
ठिकाना हुआ करता था

ज़मीन के बाहों में फ़ैला वो
बरसों पुराना आम का पेड़ हुआ करता था

ख्वाब तब कुछ बड़े नहीं बस
हरे हरे कैरियों पर सटीक निशाना लगाने का होता था

जाने कहाँ गयी वो मासूमियत जब आम के बीज को मिट्टी में दबाकर

एक छोटे से बीज को बड़े से पेड़ में
बदलने का ख्वाब देखा जाता था

कपड़ों पर दाग़ लगने का भी
कुछ होश या फिर ख़बर नहीं था

आम के अलावा शाम में
कोई ज़िक्र नहीं था

बेफ़िक्रि के शहर में
फ़िसल जाते थे लम्हे तमाम

बचपन में इस संगीन ज़माने से
कोई लेना देना नहीं था

अब जब मिलता हूँ आम से
बाज़ार के ठेले पर

वो बचपन की यादें
तलाशने लगता हूँ

कीमत कितनी भी बोले बेचनेवाला
बेशकीमती लडकपन को
फ़िर जी उठता हूँ

भीड़ से एक आम उठाकर
हाथों में लिए महक उसकी खुद में भरते हुए

कुछ चहरे पर मुस्कान
कुछ याद का कारवाँ लिए

कुछ आंखों में नमी
कुछ वक्त को पिछे ले जाने की चाहत लिए

दिल ही दिल में
आम से कह देता हूँ

तू तब फ़कत आम नहीं
मेरा बचपन हुआ करता था

Sansruti

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